भीगी भीगी सी खुबू
मन में मेरे छाती हुई !
गुदगुदी करती हुई ,
दिल में मेरे बस जाती है !
क्या करू कैसे करू
रोकू इसे समझ नही पाती हूँ में!
ये क्या है जो मुझको हुआ है
सोच सोच के गबराती हूँ में !
रह जाती है समझदारी में
धरी की धरी यूही ,
कहतें है क्या इसको पता
नही जान पाती हूँ में!
छोड़ो क्या जानना और क्या सोंचना
हर बात समझनी जरुरी भी तो नही ,
कुछ बातें तो बस रह जाती होठों पे रुकी !
रुकने दू ,या जाने दू इसको निकल में अपने दिल से ,
इसी कशमकश में थी पढ़ी !
अब निकल ही गयी है तो
जाने दो ,जिसने सुनी है ये उसी की हो गयी है !
रखेगा वो संभाल के,
बात मेरे दिल की अपने दिल में उतारके !